Kumar Vishwas Shyari & Poetry in Hindi Font

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dr kumar vishwas poems and shayri


बात ऊँची थी मगर बात जरा कम आंकी
उसने ज़ज्बात की औकात जरा कम आंकी
वो फरिस्ता कह कर मुझे जलील करता रहा
मैं इंसान हूँ मेरी औकात जरा काम आंकी !!


इस उड़ान पर अब शर्मिंदा मैं भी हू और तू भी है
आसमान से गिरा परिंदा मैं भी हु और तू भी है
छूट गई रास्ते मे जीने-मरने की सारी कसमें
अपने अपने हाल मे जिन्दा मैं भी हूँ और तू भी है !!


हमारे शेर सुन कर भी जो खामोश इतना है
खुदा जाने गुरूर-ए हुस्न में मदहोश कितना है
किसी प्याले से पूछा है सुराही मैं सबाब में का
जो खुद बेहोश हो वो क्या बताये के होश कित्न्ना है !!


एक दो रोज में हर आँखें उब्ब जाती हैं
मुझको मंजिल नहीं रास्ता समझने लगती हैं
जिनको हासिल नहीं वो जान देते रहते हैं
जिनको मिल जाऊं वो सस्ता समजने लगते हैं !!


मेरी आँखों में मोहबत की चमक आज भी है
हालांकि उसको मेरे प्यार पे शक़ आज भी है
नाव में बैठ कर धोये थे उसने हाथ कभी
पूरे तालाब मे मेहंदी की महक आज भी है !!


कोई ख़ामोश है इतना बहाने भूल आया हूँ
किसी की एक तरनुम में तराने भूल आया हूँ
मेरी अब राह मत देखना ऐ आसमां वालों
मैं एक चिड़िआ की आँखों में उड़ाने भूल आया हूँ !!


कोई कब तक महज सोचे , कोई कब तक महज गाये
इलाही क्या ये मुमकिन है के कुछ ऐसा भी हो जाये
मेरा मेहताब उसकी रात के आग़ोश में पिघले
मैं उसकी नींद में जागू वो मुझमें घुल के सो जाये !!


हमें बेहोश कर साकी , पिला भी कुछ नहीं हमको
कर्म भी कुछ नहीं हमको , सिला भी कुछ नहीं हमको
मोहब्बत ने दे दिआ है सब , मोहब्बत ने ले लिया है सब
मिला कुछ भी नहीं हमको , गिला भी कुछ नहीं हमको !!


खुद से भी न मिल सको इतने पास मत होना
इश्क़ तो करना मगर देवदास मत होना
देना , चाहना , मांगना या खो देना
ये सारे खेल है इनमें उदास मत होना !!


मिल गया था जो मुक़द्दर वो खो के निकला हूँ
मैं एक लम्हा हू हर बार रो के निकला हूँ
राह-ए -दुनिया में मुझे कोई भी दुश्वारी नहीं
मैं तेरी ज़ुल्फ़ के पेंचों से हो के निकला हूँ !!

कोई दीवाना कहता है....... 

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बदल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है

मोहब्बत एक एहसासों की पावन सी कहानी हैं
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी थी
यहाँ सब लोग कहते हैं मेरी आँखों में आंसूं हैं
जो तू समजे तो मोती है जो ना समजे तो पानी है

बहुत बिखरा बहुत थपेड़े सह नहीं पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया
अधूरा अनसुना ही रह गया यूँ प्यार का किस्सा
कभी तुम सुन नहीं पाये मैं कह नहीं पाया

समंदर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आंसूं प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

भर्मर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का
मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हंगामा




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